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बहन के साथ चूत चुदाई का मजा-3

by freesexstory.co.in
June 15, 2026
in bhai bahan
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बहन के साथ चूत चुदाई का मजा-3: में पढ़े आगे की स्टोरी

इधर-उधर देख कर मैंने भी धीरे से बोला- नहीं कोई नहीं देख पाएगा।
दीदी फिर से बोलीं- स्क्रीन की लाइट काफ़ी ज़्यादा है और इसमें कोई भी हमें देख सकता है।

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मैंने दीदी से कहा- अपना जैकेट उतार कर अपनी गोद में रख लो।
दीदी ने थोड़ी देर रुक कर अपनी जैकेट उतार कर अपनी गोद में रख लीं। और इससे उनकी जाँघ और मेरा हाथ दोनों जैकेट के अंदर छुप गया।

मैं अब अपना हाथ दीदी के स्कर्ट के अंदर डाल कर के उनके पैरों और जाँघों को सहलाने लगा।
दीदी फिर फुसफुसा कर बोलीं- कोई हमें देख ना ले!
मैंने दीदी को समझाते हुए कहा- हमें कोई नहीं देख पाएगा। आप चुपचाप बैठी रहो।

मैंने अपना हाथ अब दीदी के जाँघों के अंदर तक ले जाकर उनकी जाँघ के अंदरूनी भाग को सहलाने लगा और धीर-धीरे अपना हाथ दीदी की पेंटी की तरफ़ बढ़ाने लगा।

मेरा हाथ इतना घूम गया की दीदी की पेंटी तक नहीं पहुँच रहा था।
मैंने फिर हल्के से दीदी के कानों में कहा- थोड़ा नीचे खिसक कर बैठो न।
दीदी ने हँसते हुए पूछा- क्या तुम्हारा हाथ वहाँ तक नहीं पहुँच रहा है।

‘हाँ’ मैंने दबी जुबान से दीदी को बोला।
दीदी धीरे से हँसते हुए बोलीं- तुमको अपना हाथ कहाँ तक पहुँचाना है?
मैं शर्माते हुए बोला- तुमको मालूम तो है!

दीदी मेरी बातों को समझ गईं और नीचे खिसक कर बैठीं। मेरा हाथ शुरू से दीदी के स्कर्ट के अंदर ही घुसा हुआ था और जैसे ही दीदी नीचे खिसकी मेरा हाथ जा करा अपने आप दीदी की पेंटी से लग गया।

फिर मैं अपने हाथ को उठा कर पेंटी के ऊपर से दीदी की चूत पर रखा और ज़ोर से दीदी की चूत को छू लिया।

यह पहलीं बार था कि अपने दीदी की चूत को छू रहा था। दीदी की चूत बहुत गर्म थीं। मैं अपनी ऊँगलीं को दीदी की चूत के छेद के ऊपर चलाने लगा।

थोड़ी देर के बाद दीदी फुसफुसा कर बोलीं- रुक जाओ, नहीं तो फिर से मेरी पेंटी गीलीं हो जायेगी।
लेकिन मैंने दीदी की बात को अनसुनी कर दी और दीदी की चूत के छेद को पेंटी के ऊपर से सहलाता रहा।

दीदी फिर से बोलीं- प्लीज़, अब मत करो, नहीं तो मेरी पेंटी और स्कर्ट दोनों गंदी हो जायेगीं।
मैं समझ गया कि दीदी बहुत गर्मा गईं हैं। लेकिन मैं यह भी नहीं चाहता था कि जब हम लोग सिनेमा से निकलें तो लोगों को दीदी गंदी स्कर्ट दिखे। इसलिए मैं रुक गया।

मैंने अपना हाथ चूत पर से हटा कर दीदी की जाँघों को सहलाने लगा। थोड़ी देर के बाद इंटरवल हो गया।

इंटरवल होते ही मैं और दीदी अलग-अलग बैठ गए और मैं उठ कर पॉपकॉर्न और पेप्सी ले आया।

मैंने दीदी से धीरे से कहा- तुम टॉयलेट जाकर अपनी पेंटी निकाल कर नंगी होकर आ जाओ।

दीदी ने आँखें फाड़ कर मुझसे पूछा- मैं अपनी पेंटी क्यों निकालूँ?
मैं हँस कर बोला- निकाल लेने से पेंटी गीलीं नहीं होगी।
दीदी ने तपाक से पूछा- और स्कर्ट का क्या करें? क्या उसे भी उतार कर आऊँ?

‘सिंपल सी बात है जब टॉयलेट से लौट कर आओगी तो बैठने से पहले अपनी स्कर्ट उठा कर बैठ जाना’ मैंने दीदी को आँख मारते हुए बोला।

दीदी मुस्कुरा कर बोलीं- तुम बहुत शैतान हो और तुम्हारे पास हर बात का जवाब है।
जैसा मैंने कहा था, दीदी टॉयलेट में गईं और थोड़ी देर के बाद लौट आईं।

जब मैं दीदी को देख कर मुस्कुराया तो दीदी शर्मा गईं और अपनी गर्दन झुका लीं।
हम लोग फिर से हॉल में चले गए जब बैठने लगीं तो अपनी स्कर्ट ऊपर उठा लीं, लेकिन पूरी नहीं।

हम लोगों के जैकेट अपने-अपने गोद में थीं और हम लोग पॉपकॉर्न खाना शुरू किया। थोड़ी देर के बाद हम लोगों ने पॉपकॉर्न खत्म किए और फिर पेप्सी भी खत्म कर लिया।

फिर हम लोग अपनी-अपनी सीट पर नीचे हो कर पैर फैला कर आराम से बैठ गए थोड़ी देर के बाद मैंने अपना हाथ बढ़ा कर दीदी की गोद पर रखी हुई जैकेट के नीचे से ले जाकर के दीदी की जाँघों पर रख दिया।

मेरे हाथों को दीदी की जाँघों से छूते ही दीदी ने अपने जाँघों को और फैला दिया। फिर दीदी ने अपने चूतड़ थोड़ा ऊपर उठा करके अपने नीचे से अपनी स्कर्ट को खींच करके निकाल दिया और फिर से बैठ गईं अब दीदी हॉल के सीट पर अपनी नंगी चूतड़ों के सहारे बैठी थीं।

सीट की रेग्जीन से दीदी को कुछ ठंड लगीं पर वो आराम से सीट पर नीचे होकर के बैठ गईं। मैं फिर से अपने हाथ को दीदी की स्कर्ट के अंदर डाल दिया। मैं सीधे दीदी की चूत पर अपना हाथ ले गया।

जैसे ही मैं दीदी की नंगी चूत को छुआ, दीदी झुक गईं जैसे कि वो मुझे रोक रही हो। मुझे दीदी की नंगी चूत में हाथ फेरना बहुत अच्छा लग रहा था। मुझे चूत पर हाथ फेरते-फेरते चूत के ऊपरी भाग पर कुछ बाल का होना महसूस हुआ।

मैं दीदी की नंगी चूत और उसके बालों को धीरे धीरे सहलाने लगा। मैं दीदी की चूत को कभी अपने हाथ में पकड़ कर कस कर दबा रहा था, कभी अपने हाथ उसके ऊपर रगड़ रहा था और कभी-कभी उनकी क्लिंट को भी अपने उँगलियों से रगड़ रहा था।

मैं जब दीदी की क्लिंट को छेड़ रहा था तब दीदी का शरीर कांप सा जाता था। उनको एक झुरझुरी सी होती थीं। मैंने अपनी एक ऊँगलीं दीदी की चूत के छेद में घुसेड़ दी।

ओह भगवान चूत अंदर से बहुत गर्म थीं और मुलायम भी थीं। चूत अंदर से पूरी रस से भरी हुई थीं।

मैं अपनी ऊँगलीं को धीरे-धीरे चूत के अंदर और बाहर करने लगा। थोड़ी देर के बाद मैंने अपनी दूसरी ऊँगलीं भी चूत में डाल दी। ये तो और भी आसानी से चूत में समा गईं।

मैंने दोनों उँगलियों से दीदी चूत को चोदना शुरू किया।
दीदी की तेज सांसों की आवाज मझे साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थीं। थोड़ी देर के बाद दीदी का शरीर अकड़ गया, कुछ ही देर के बाद दीदी शांत हो कर सीट पर बैठ गईं।

अब दीदी की चूत में से ढेर सारा पानी निकलने लगा। चूत की पानी से मेरा पूरा हाथ गीला हो गया।

मैं थोड़ी देर रुक कर फिर से दीदी की चूत में अपनी ऊँगलीं चलाने लगा। थोड़ी देर के बाद दीदी दोबारा झड़ी। फिर मुझे जब लगा कि सिनेमा अब खत्म होने वाला है, तो मैंने अपना हाथ दीदी की चूत पर से हटा लिया।

जैसे ही सिनेमा खत्म हुआ, मैं और दीदी उठ कर बाहर निकल आए।
बाहर आने के बाद मैंने दीदी से कहा- अगले शो में जो भी उस सीट पर बैठेगा उसका पैंट या उसकी साड़ी भीग जाएगी।

दीदी मेरे बातों को सुन कर बहुत शर्मा गईं और मुझसे नज़र हटा लीं।

दीदी टॉयलेट चलीं गईं हो सकता था, कि अपनी चूत और जाँघों को धोकर साफ़ करने के लिए और अपनी पेंटी फिर से पहनने के लिए गईं हों।

अभी सिर्फ़ तीन बजे थे और मैंने दीदी से बोला- तो बहुत टाइम है और माँ भी घर पर सो रही होंगी।

क्या तुम अभी घर जाना चाहती हो? वैसे मुझे कुछ प्राइवेट में चलने का इच्छा हैं।
क्या तुम मेरे साथ चलोगी?
दीदी मेरी आँखों में झाँकती हुई बोलीं- प्राइवेट में चलने की क्या बात हैं? वैसे मैं भी अभी घर नहीं जाना चाहती।

मैं बोला- प्राइवेट का मतलब है कि किसी होटल में जाना हैं?
दीदी बोलीं- सिर्फ़ होटल? या और कुछ?
मैं दीदी से बोला- सिर्फ़ होटल या और कुछ! मतलब?
दीदी बोलीं- तेरा मतलब होटल के कमरा से है?

‘हाँ मेरा मतलब होटल के कमरे से ही है।’ मैंने कहा।
दीदी ने तब मुझसे फिर पूछा- होटल के कमरे में ही क्यों?
मैंने दीदी की बातों को सुन कर यह समझा कि दीदी ने अभी भी होटल चलने के लिए ना नहीं किया हैं।

मैंने दीदी की आँखों में झाँकते हुए बोला- अभी तक मैंने कई बार तुम्हारी चूची को छुआ, दबाया, मसला और चूसा है, फिर मैंने तुम्हारी चूत को भी छुआ और उसके अंदर अपनी ऊँगलीं भी डालीं। और तुमने कभी भी मना नहीं किया।

मैं आगे बढ़ने से रुका तो इस बात से कि हमारे पास पूरी प्राइवेसी नहीं थीं। इस बात के डर से कि कोई आ ना जाए, या हमें देख न ले। इसलिए मैं चाहता हूँ कि अब होटल के कमरे में जाकर हम लोगों को पूरी प्राइवेसी मिले।

मैं इतना कह कर रुक गया और दीदी की तरफ़ देखने लगा कि अब दीदी भी कुछ बोले। जब दीदी कुछ नहीं बोलीं तो मैंने फिर उनसे कहा- तुम क्या चाहती हो?

दीदी मुझसे बोलीं- मतलब यह हुआ कि तुम इसलिए मेरे साथ होटल जाना चाहते हो ताकि वहाँ जा कर तू मुझे अच्छी तरफ़ से छू सके। मेरे दूध को चूस सके और मेरे पैरों के बीच अपना हाथ डाल कर मजा ले सके?

‘ठीक’ कह रही हो, दीदी। मैं जब भी तुम्हें छूता हूँ तो हम लोगों के पास प्राइवेसी ना होने की वजह से रुकना पड़ता है,

‘जैसे आज सिनेमा हॉल में ही देख लो’ मैंने दीदी से कहा।
‘तो तू मुझे ठीक से और बिना डर के छूना चाहता है। मेरी चूची पीना चाहता है, और मेरी टांगो के बीच हाथ डाल कर अपनी ऊँगलीं चूत में डाल कर देखना चाहता है?’

दीदी ने मुझसे पूछा। मैंने तब थोड़ा झल्ला कर दीदी से कहा- तुम बिल्कुल सही कह रही हो। और मुझे लगता है कि तुम भी यही चाहती हो।
दीदी कुछ नहीं बोलीं और मैं उनकी चुप्पी को उनकी हाँ समझ रहा था। फिर दीदी थोड़ी देर तक सोचने के बाद बोलीं- कमरे में जाने का मतलब होता है कि हम वो सब भी???

मैंने तब दीदी को समझाते हुए कहा- लेकिन तुम चाहोगी तभी। नहीं तो कुछ नहीं।
दीदी फिर भी बोलीं- पता नहीं सोनू, यह बहुत बड़ा क़दम है।

मैंने तब फिर से दीदी को समझाते हुए बोला- बाबा, अगर तुम नहीं चाहोगी तो वो सब काम नहीं होगा और वही होगा जो जो तुम चाहोगी। लेकिन मुझे तुम्हारी दोनों मुसम्मियाँ बिना किसी के डर के साथ पीना है बस!

मैं समझ रहा था कि दीदी मन ही मन चाह तो रही थीं कि मैं उनकी चूची को बिना किसी डर के चूसूं और उनकी चूत से खेलूँ।

दीदी बोलीं- बात कुछ समझ में नहीं आ रही है। लेकिन यह बात तो तय है कि मैं अभी घर नहीं जाना चाहती हूँ।
इसका मतलब साफ़ था कि दीदी मेरे साथ होटल में और होटल के कमरे में जाना चाहती हैं।

इसलिए मैंने पूछा- तो होटल चलें? दीदी मेरे साथ चल पडीं। मैं बहुत खुश हो गया। दीदी मेरे साथ होटल में चलने के लिए राज़ी हो गईं है।

मैं खुशी-खुशी होटल की तरफ़ चल पड़ा। मैं इतना समझ गया था कि शायद दीदी मुझे खुल कर अपनी चूची और चूत मुझसे छुआना चाहती हैं और हो सकता हैं कि वो बाद में मुझसे अपनी चूत भी चुदवाना भी चाहती हों।

यह सब सोच-सोच कर मेरा लंड खड़ा होने लगा। मैं सोच रहा था कि आज मैं अपनी दीदी को ज़रूर चोदूंगा। मैं बहुत खुश था और गर्म हो रहा था।

मुझे यह मालूम था कि उस सिनेमा हॉल के पास दो-तीन ऐसे होटल हैं जहाँ पर कमरे घंटे के हिसाब से मिलते हैं। मैं एक दो बार उन होटलों में अपने गर्लफ्रेंड के साथ आ चुका हूँ।

मैं वैसे ही एक होटल में अपनी दीदी को लेकर गया और वहाँ बात करके एक कमरा तय किया और कमरे का किराया भी दे दिया। होटल का वेटर हम लोगों को एक कमरे में ले गया।

जैसे ही वेटर वापस गया, मैंने कमरे के दरवाज़े को अच्छी तरह से बंद किया। मैंने कमरे की खिड़की को भी चेक किया और उनमें पर्दा डाल दिया। तब तक दीदी कमरे में घुस कर कमरे के बीच में खड़ी हो गईं।

दीदी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था और वो चुपचाप खड़ी थीं। मैं तब बाथरूम में गया और बाथरूम की लाइट को जला करके बाथरूम का दरवाज़ा आधा बंद कर दिया, जिससे कि कमरे में बाथरूम से थोड़ी बहुत रोशनी आती रहे। फिर मैंने कमरे की रोशनी को बंद कर दिया।

दीदी आराम से बिस्तर के एक किनारे पर बैठ गईं। कमरे में रोशनी बहुत कम थीं, लेकिन हम लोग एक दूसरे को देख पा रहे थे।

मैं अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा और दीदी से बोला- तुम भी अपने कपड़े उतार दो।
दीदी ने भी कपड़े उतारने शुरू कर दिए। जैसे ही अपना पैंट खोला तो मैंने देखा की दीदी भी अपनी ब्रा और पेंटी उतार रही हैं।

अब दीदी मेरे सामने बिल्कुल नंगी हो चुकी थीं। मैं समझ गया कि दीदी भी आज अपनी चूत चुदवाना चाहती हैं।

अब मैं धीरे-धीरे बिस्तर की तरफ़ बढ़ा और जा कर दीदी के बगल में बैठ गया। पलंग पर बैठ कर मैंने दीदी को अपनी बाहों में भर लिया और उनको अपने पैरों के बीच खड़ा कर दिया।

कमरे की हल्की रोशनी में भी मुझे अपनी दीदी की नंगी जवानी और मादक बदन साफ़-साफ़ दिख रहा था और मुझे उनकी नंगी चूचियों को पहली बार देख कर मजा आ रहा था।

मैंने अब तक दीदी को सिर्फ़ कपड़ों के ऊपर से देखा था और मुझे पता था की दीदी का बदन बहुत सुडौल और भरा हुआ होगा, लेकिन इतनी अच्छी फिगर होगी ये नहीं पता था।

दीदी की गोल संतरे सी चूची, पतली सी कमर और गोल-गोल सुंदर से चूतड़ों को देख कर मैं तो जैसे पागल ही हो गया। मैं धीरे से अपने हाथों में दीदी की चूचियों को लेकर के धीरे-धीरे बड़े प्यार से दबाने लगा।

‘दीदी तुम्हारी चूचियाँ बहुत प्यारी हैं बहुत ही सुंदर और ठोस हैं।’ मैंने दीदी से कहा और दीदी ने मुस्कुरा कर अपने हाथ मेरे कंधों पर रख दिए।

मैंने झुक करके अपने होंठ उनकी चूचियों पर रख दिए। मैं दीदी की चूचियों के निप्पलों को चूसने लगा और दीदी सिहर उठीं।

मैं अपने मुँह को और खोल करके दीदी की एक चूची को मेरे मुँह में भर लिया और चूसने लगा।
मेरा दूसरा हाथ दीदी की दूसरी चूची पर था और उसको धीरे-धीरे दबा रहा था। फिर मैं अपना मुँह जितना खोल सकता खोल करके दीदी की चूची को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा।
अपने दूसरे हाथ को मैं धीरे से नीचे लाकर के दीदी चूत को पहले सहलाया और फिर धीरे से अपनी एक ऊँगली चूत के अंदर कर घुसेड़ दी।

मैं कुछ देर तक अपने मुँह से दीदी की मुसम्मी चूसता रहा और अपने दूसरे हाथ की ऊँगली दीदी की चूत के अंदर-बाहर करता रहा। मुझे लगा रहा था कि दीदी आज अपनी चूत मुझसे ज़रूर चुदवायेंगी।

थोड़ी देर के बाद मैंने अपना मुँह दीदी की चूची पर से हटा कर दीदी को इशारे से पलंग पर लेटने के लिए बोला। दीदी चुपचाप पलंग पर लेट गईं और मैं भी उनके पास लेट गया।

फिर मैं दीदी को अपने बाहों में भर कर उनकी होठों को चूमने और फिर चूसने लगा।

मेरा हाथ फिर से दीदी की चूचियों पर चला गया और दीदी की बड़ी-बड़ी चूचियों को अपने हाथों ले कर बड़े आराम से मसलने लगा। इस वक़्त दीदी की चूचियों को मसलने में मुझे किसी का डर नहीं था और बड़े आराम से दीदी की चूचियों को मसल रहा था।

चूची मसलते हुए मैंने दीदी से बोला- तुम्हारी चूचियों का जवाब नहीं, बड़ी मस्त मुस्म्मियाँ हैं। मन करता है कि मैं इन्हें खा जाऊँ।

मैंने अपना मुँह नीचे करके दीदी की चूची के एक निप्पल को अपने मुँह में भर कर धीरे-धीरे चूसने लगा। थोड़ी देर के बाद मैंने अपना एक हाथ नीचे करके दीदी की चूत पर ले गया और उनकी चूत से खेलने लगा, और थोड़ी देर के बाद अपनी एक ऊँगली चूत में घुसेड़ कर अंदर-बाहर करने लगा।

दीदी के मुँह से मादक सिसकारियाँ निकलने लगीं।

थोड़ी देर के बाद दीदी की चूत ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया। मैं समझ गया कि दीदी अब चुदवाने के लिए तैयार हैं। मैं भी दीदी के ऊपर चढ़ कर उनको चोदने के लिए बेताब हो रहा था।

थोड़ी देर तक मैं दीदी की चूची और चूत से खेलता रहा और फिर उनसे सट गया।

मैंने दीदी के ऊपर झुकते हुए दीदी से पूछा- तुम तैयार हो? बोलो ना दीदी क्या तुम अपनी छोटे भाई का लौड़ा अपनी चूत के अंदर लेने के लिए तैयार हो?

उस समय मैं मन ही मन जानता था कि दीदी की चूत मेरा लंड खाने के लिए बिल्कुल तैयार है। और दीदी मुझे चोदने से ना नहीं करेंगी।

दीदी तब मेरी आँखों में झाँकते हुए बोलीं- सोनू, क्या मैं इस वक़्त ना कर सकती हूँ? इस समय तू मेरे ऊपर चढ़ा हुआ है और हम दोनों नंगे हैं।

दीदी ने अपना हाथ बढ़ा कर मेरे लंड को पकड़ लिया और उसे सहलाने लगीं। तब मैंने अपने लंड को अपने हाथ में लेकर दीदी की चूत से भिड़ा दिया।
चूत पर लंड लगते ही दीदी ‘आह! अहह्ह्ह! ओहह्ह्ह्ह!’ करने लगीं।

मैंने हल्के से अपने कमर हिला कर दीदी की चूत में अपने लंड का सुपाड़ा फँसा दिया। दीदी की चूत बहुत टाइट थीं लेकिन वो इतना रस छोड़ रही थीं कि चूत का रास्ता बिल्कुल चिकना हो चुका था।

जैसे ही मेरा लंड का सुपाड़ा दीदी की चूत में घुसा, दीदी उछल पड़ीं और चीखने लगीं- ‘मेरिई चूऊत फटीईईए जा रहिईई हैंईई निकाल अपना लंड मेरी चूऊऊत से ईईए है मैं मर गईंई मेरिईई चूऊऊओत फआआट गईंई’

मैंने दीदी के होठों को चूमते हुए बोला- दीदी, बस हो गया और थोड़ी देर तक तकलीफ़ होगी और फिर मजा ही मजा है। लेकिन दीदी फिर भी गिड़गिड़ाती रही।

मैंने दीदी की कोई बात नहीं सुनी और उनकी चूचियों को अपने हाथों से मज़बूती से पकड़ते हुए एक और ज़ोरदार धक्का मारा और मेरा पूरा का पूरा लंड दीदी की चूत की में घुस गया। दीदी की चूत से खून की कुछ बूँद निकल पड़ीं।
मैं अपना पूरा लंड डालने के बाद चुपचाप दीदी के ऊपर लेटा रहा और दीदी की चूचियों को मसलता रहा। थोड़ी देर के बाद दीदी ने मेरे नीचे से अपनी कमर उठाना शुरू कर दी।

मैं समझ गया कि दीदी की चूत का दर्द खत्म हो गया है और वो अब मुझसे खुल कर चुदवाना चाहती हैं।

मैंने भी धीरे से अपना लौड़ा थोड़ा सा बाहर खींचा और उसे फिर दीदी की चूत में हल्के झटके के साथ घुसेड़ दिया। दीदी की चूत ने मेरा लंड कस कर पकड़ रखा था और मुझे लंड को अंदर-बाहर करने में थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ रही थीं।

लेकिन मैं भी नहीं रुका और धीरे-धीरे अपनी स्पीड बढ़ाना शुरू कर दी। दीदी भी मेरे साथ-साथ अपनी कमर उठा-उठा कर मेरे हर धक्कों का जबाब बदस्तूर दे रही थीं। मैं जान गया कि दीदी की चूत रगड़-रगड़ कर लंड खाना चाहती है।

मैंने भी दीदी को अपनी बाहों में भर कर उनकी चूचियों को अपने मुँह में भर कर धीरे-धीरे लंड उठा-उठा करके धक्के मारना शुरू किया। अब मेरा लंड आसानी से दीदी की चूत में आ-जा रहा था।

दीदी भी अब मुझे अपने बाहों में भर करके चूमते हुए अपनी कमर उचका रही थीं और बोल रही थीं- भाई, बहुत अच्छा लग रहा है और ज़ोर-ज़ोर से चोदो मुझे।

मेरी चूत में कुछ चींटियाँ सी रेंग रही हैं। अपने लंड की रगड़ से मेरी खाज दूर कर दो। चोदो और ज़ोर-ज़ोर से चोदो मुझे।

मैं अब अपना लंड दीदी की चूत के अंदर डाल कर कुछ सुस्ताने लगा।

दीदी तब मुझे चूमते हुए बोलीं- क्या हुआ, तू रुक क्यों गया? अब मेरी चूत की चुदाई पूरी कर और मुझे रगड़-रगड़ कर चोद करके मेरी चूत की प्यास बुझा मेरे जालिम भाई।

मैं बोला- चोदता हूँ दीदी। थोड़ा मुझे आपकी चूत में फँसे लौड़े का आनंद तो उठा लेने दो। अभी मैं तुम्हारी चूत चोद-चोद कर फाड़ता हूँ।
मेरी दीदी बोलीं- “साले तुझे मजा लेने की पड़ी है, अभी तो तू मुझे जल्दी-जल्दी चोद।” मैं मरी जा रही हूँ!

मैं उनकी बात सुन कर ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाने लगा और दीदी भी मुझे अपने हाथों और पैरों से जकड़ कर अपने चूतड़ उछाल-उछाल कर अपनी चूत चुदवाने लगीं।

मैंने थोड़ी देर तक दीदी की चूत में अपना लंड पेलने के बाद दीदी से पूछा- कैसा लग रहा है, अपने छोटे भाई का लंड अपनी चूत में डलवा कर?

मैं अब दीदी से बिल्कुल खुल कर बातें कर रहा था। और उन्हें अपने लंड से छेड़ रहा था।

‘यह काम हम लोगों ने बहुत ही बुरा किया। लेकिन मुझे अब बहुत अच्छा लग रहा है।’ दीदी मुझे अपने सीने से चिपकाते हुए बोलीं।

थोड़ी देर के बाद मैं फिर से दीदी की चूत में अपना लंड तेज़ी से पेलने लगा।
कुछ देर के बाद मुझे लग रहा था कि मैं अब झड़ने वाला हूँ। इसलिए मैंने अपना लंड दीदी की चूत से निकाल कर अपने हाथ से पकड़ लिया और पकड़े रखा।

मैंने दीदी से कहा- अपने मुँह में लोगी?
दीदी ने पहले कुछ सोचा फिर अपना मुँह खोल दिया। मैंने लौड़ा उनके मुँह में दे दिया और अपना वीर्य उनके मुँह में छोड़ दिया।

दीदी ने मेरा माल अपने मुँह में भर लिया और उसको गटक लिया। दीदी ने आसक्त भाव से मेरी तरफ देखा और मैंने अपने होंठ उनके होंठों से लगा दिए।

भाई बहन की इस चुदाई ने भले ही समाज की मर्यादाओं को भंग कर दिया हो, पर मेरी और मेरी दीदी की कामनाओं को तृप्त कर दिया था।

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