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दोस्त की बहन, बुआ और माँ की चुदाई-1

by mahesh srivastava
June 15, 2026
in Aunty Sex, Family Sex
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आज की स्टोरी में मेरे दोस्त दिलजीत की मदद के बदले में कैसे दिलजीत की बहन, बुआ और माँ की मदमस्त चुदाई का मौका मिला.. इसके बारे में पढ़ेगे।

Freesexstory.online के सभी पाठक-पाठिकाओं को मेरी और से प्रणाम आप सभी अपने लंड और चूत को थाम ले और इस स्टोरी का आनंद ले।

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यह कहानी आज से 10 वर्ष पहले उस समय की है जब में 21 वर्ष का था और मुंबई में रहता था।

मेरे पास के कमरे में एक नया किरायेदार दिलजीत रहने आया. वो भी मेरी तरह अकेला ही किराये के मकान में रहता था. मेरी हमउम्र का होने के कारण कुछ दिनों में ही हम दोनों में गहरी दोस्ती हो गई.

में एक सरकारी कर्मचारी हूँ और मेरी एजुकेशन भी अच्छी है और दिलजीत एक प्राइवेट फैक्ट्री में मशीन ऑपरेटर का काम करता था.

उसके परिवर में सिर्फ़ 4 सदस्य थे. उसकी विधवा माँ 38 साल, विधवा बुआ 35 साल और 18-19 साल कुँवारी बहन थीं. दिलजीत के अलावा बाक़ी सभी लोग गाँव में रहकर अपनी खेती बाड़ी करते थे.

दिलजीत की माँ और बहन दीवाली की छुट्टियों में 1 महीने के लिये मुम्बई आए हुए थे. दिवाली के बाद दिलजीत की बहन की छुट्टियाँ ख़त्म होने के कारण उन्हें गाँव जाना था लेकिन फैक्ट्री में अधिक काम के कारण दिलजीत को अगले 1 महीने तक कोई भी छुट्टी नहीं मिल सकती थीं.


दिलजीत अपनी माँ और बहन अकेला गाँव नहीं भेज सकता था और उनका गाँव जाना भी बहुत जरूरी था इसी कारण से दिलजीत बहुत परेशान रहने लगा.

दिलजीत को परेशानी में देख कर एक दिन मैंने पूछा, क्या बात है यार? आज कल तुम ज्यादा परेशान रहते हो!

दिलजीत: बहन की छुट्टियाँ ख़त्म हो गई है और उन्हें गाँव जाना है लेकिन मुझे काम ज्यादा होने के कारण 1 महीने तक छुट्टी नहीं मिल रही है और में मेरी माँ और बहन को अकेले गांव नहीं भेज सकता हूँ इसलिए काफ़ी दिनों से परेशान हूँ.

में- यार अगर में तुम्हारी परेशानी का हल कर सकता हूँ और इसमें मेरा भी फ़ायदा हो जायेगा.

दिलजीत: यार, अगर तुम मेरी परेशानी हल कर दो तो मैं तुम्हारा एहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूँगा! लेकिन, एक बात समझ नहीं आई की मेरी परेशानी का हल करने से तुम्हारा फ़ायदा कैसे होगा?

मैंने कहा मुझे सरकार की तरफ़ से हर साल 1 महीने की छुट्टी मिलती है और कही भी आने-जाने का किराया भी मिलता है और उसी के साथ उस महिने की सैलरी भी मिलती है.

लेकिन अगर में छुट्टी नहीं लेता हूँ तो, छुट्टी ऐसे ही ख़राब हो जाती है और और कुछ मिलता भी नहीं है.

दिलजीत: यार, तब तो तुम मेरी माँ और बहन को गाँव पहुँचा दो, साथ ही साथ मेरा गाँव भी घूम आना!

अगले दिन मैंने लीव के लिए एप्लीकेशन दी और उसके अगले दिन ही वह मंजूर हो गई.

दिलजीत लोकल टिकट ले हमे रेलवे स्टेशन पहुँचाने आया लेकिन जब ट्रेन चली तो मैंने टीटी से बात कर किसी तरह बर्थ की 2 सीट ले ली.

गाड़ी के रवाना होने के कुछ समय बाद में हम सभी ने खाना खाया और गपशप करने लगे. कुछ समय बाद दिलजीत की बहन ने कहा, भैया मुझे नींद आ रही है! और वो उपर की सीट पर जाकर सो गई.

कुछ देर बाद दिलजीत की माँ भी नीचे के बर्थ पर चादर ओढ़ कर सो गई और कहा कि, तुम अगर सोना चाहते हो तो मेरे पैर के पास सिर रख कर सो जाना.

कुछ देर के बाद मुझे भी नींद आने लगी, और मैंने पैंट खोल कर शोर्ट पहन लिया और उनके पैर के पास सिर रख कर सो गया.

दिलजीत की माँ एक तरफ़ करवट कर के सो गईं. कुछ देर बाद मुझे भी नींद आ गई और मैं भी उनकी चादर ओढ़ कर सो गया.

अचानक! रात में मेरी नींद खुली तो मेरे सामने दिलजीत की माँ की साड़ी कमर के उपर थीं और उनकी चूत और घनी झाँटे दिखाई दे रही थीं और उनका हाथ मेरे शोर्ट पर लण्ड के करीब था.

सामने का नजारा देख मेरा लण्ड शोर्ट के अन्दर फड़फड़ाने लगा. मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि, क्या करूँ. मैं तुरंत ही उठकर पेशाब करने चला गया.

मेरे वापस आने तक भी दिलजीत की माँ उसी अवस्था में सोई हुई थीं. मैं भी उनकी तरफ़ करवट कर सो गया. लेकिन मेरी आँखों के सामने चुत दिखाई देने के कारण से मुझे नींद नहीं आ रही थीं.

थोड़ी देर बाद एक स्टेशन आया. वहाँ पर जब ट्रेन रुकी तो मेरे दिमाग़ में आईडिया आया और मैंने  हमारे केबिन की सभी लाइट बंद कर दी.

अब में वापस आया और मैंने अपना खड़ा लण्ड शोर्ट से निकालकर उसके सुपाड़े की टोपी नीचे किया और  थूक लगा कर सुपाड़े को चूत के मुख पर रख कर सोने का नाटक करने लगा.

गाड़ी के धक्के के कारण धीरे धीरे मेरा आधा सुपाड़ा उनकी चूत में चला गया लेकिन दूसरी तरफ़ से कोई हरकत नहीं हुई. मुझे लगा की या तो वो गहरी नींद में थीं, या वो भी गर्म हो गई है और मजे ले रही है.

एक बार तो मेरा दिल हुआ कि, में ट्रेन के झटकों के साथ अपना पूरा लण्ड दिलजीत की माँ की चूत में डाल दूँ. लेकिन मन में संकोच और डर के कारण मेरी हिम्मत नहीं हुई.

ट्रेन के धक्को से सिर्फ़ सुपाड़े का थोड़ा सा हिस्सा चूत में अन्दर बाहर हो रहा था और इसी तरह से चोदते हुए मेरे लण्ड ने अपना सारा लावा उनकी चूत और झांटों के ऊपर निकाल दिया और मैं अपना लण्ड शोर्ट में डाल कर सो गया.

सुबह 8 बजे दिलजीत की माँ ने उठाया और चाय पीकर तैयार होने को कहा क्योंकि हमारा स्टेशन आने वाला था। मैं जल्दी से फ़्रेश हो कर तैयार हो गया और इधर-उधर की बातें करने लगे.

स्टेशन पर उतरकर हम दिलजीत के घर पहुँचे जहाँ पर दिलजीत की बुआ ने हमारा स्वागत किया और कहा- नहा धोकर नाश्ता कर लो. नहाने के बाद हम सभी आँगन में बैठ कर नाश्ता करने लगे.

दोपहर को 11:00 बजे दिलजीत की बुआ ने माँ से कहा- भाभी जी आप लोग थके हुए होगे इसलिए आराम कीजिये मैं खेत में जा रही हूँ और शाम तक लौटूंगी.

दिलजीत की माँ ने मुझसे कहा, अगर तुम आराम करना चाहो तो आराम कर लो और अगर खेत देखना है तो बुआ के साथ चले जाओ.

मैंने कहा, ट्रेन में मेरी नींद तो पूरी हो गई है! मैं बुआ जी के साथ खेत ही चला जाता हूँ इससे मेरा टाइम भी पास हो जायेगा.

अब मैं और बुआ खेत की ओर निकल गए और रास्ते में इधर-उधर की काफ़ी बातें करते हुए खेत पहुचे. उनका खेत बहुत बड़ा था और उसके एक कोने मे एक छोटा सा मकान भी था. दोपहर होने के कारण आस-पास के खेत में कोई भी न था.

खेत पहुँच कर बुआ जी काम में लग गईं और कहा कि, अगर तुम्हे गर्मी लग रही हो तो शर्ट उतारकर कमरे में पड़ी लुंगी पहन लो और यहाँ आकर मेरी थोड़ी मदद कर दो.

मैं मकान में गया और  लुंगी बनियान पहनकर बुआ जी के काम में मदद करने लगा. काम करते हुए कभी-कभी मेरा हाथ बुआ जी के चूतड़ पर भी टच होता था.

दोपहर में 1:30 के क़रीब बुआ बोलीं- आओ अब खाना खाकर थोड़ी देर आराम करने के बाद आगे का काम में लग जाएँगे.

मैंने और बुआ ने पहले हाथ-पैर धोये फिर मकान में खाना खाने के लिए बैठ गए. बुआ मेरे सामने ही बैठ कर खाना खा रही थीं. खाना खाने के दौरान मैंने देखा कि, मेरी लुंगी जरा साईड में हट गई थी.

लुंगी हटने के कारण मेरी चड्डी से आधा लण्ड बाहर निकला हुआ था और बुआ की नज़र बार बार मेरे लण्ड पर जा रही थी. लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं कहा और बीच बीच में मेरे लण्ड को ही देखे जा रही थीं.

हमने खाना खाया तो बुआ बरतन धोने लगीं तो सिर्फ़ उनके सिर्फ़ ब्लाउज पहने होने से मुझे उनके बड़े-बड़े बूब्स साफ़ नज़र आ रहे थे. बरतन धोने के बाद मैं चटाई पर आकर लेट गया.

बुआ बोलीं- बेटा! आज तो बड़ी गर्मी है! और अपनी साड़ी खोल पेटीकोट और ब्लाऊज़ पहन कर मेरे बगल में आकर उस तरफ़ करवट कर के लेट गईं.

मैंने पीछे से उन्हें देखा तो उनकी कमर के दाहिनी ओर पेटीकोट का नाड़ा बंधा था वहा के गेप से उनकी कुछ कुछ झांटे दिखाई दे रही थी.

अब मेरा लण्ड लुंगी के अन्दर कड़क हो गया और थोड़ी देर बाद बुआ ने करवट बदली तो मैं सोने का नाटक करने लगा.

कुछ देर आराम करने के बाद बुआ उठीं और मकान के पीछे गई तो मैंने बंद पड़ी खिड़की के सुराख में आँख लगाकर देखा. बुआ वहाँ बैठ कर पेशाब करने लगी.

पेशाब करने के बाद बुआ ने अपनी चूत को सहलाया और  उठकर मकान में आने लगी तो मैं अपनी जगह आकर सो गया.

बुआ के आने के कुछ देर बाद  मैं भी उठकर पिछली तरफ़ पेशाब करने गया और खिड़की की तरफ़ लण्ड पकड़ कर पेशाब करने लगा.

पेशाब करते हुए मैंने देखा कि खिड़की थोड़ी खुली हुई थी और बुआ मेरे लण्ड को देखे जा रही थी.

पेशाब करने के बाद जब में मकान में आया तो , बुआ जी चित लेटी हुई थीं. मेरे आने के थोड़ी देर बाद बुआ बोलीं बेटा आज ना जाने क्यो, मेरी कमर बहुत दुख रही है. क्या तुम मेरी कमर की मालिश कर दोगे?

मैंने कहा- बुआ आपकी सेवा करने के लिए कैसा पूछना!

बुआ ने कहा, ठीक है! सामने दर्द निवारक तेल की शीशी पड़ी है उससे मेरी कमर की मालिश कर देना, वो पेट के बल लेट गईं तो मैं तेल लगा कर उनकी कमर की मालिश करने लगा.

थोड़ी देर कमर की मालिश के बाद वो बोली- बेटा थोड़ा नीचे मालिश करो.

मैंने कहा- बुआ इस तरह से तो आपके पेटीकोट पर तेल लग जाएगा. आप अपने पेटीकोट का नाड़ा ढीला कर दो इससे मालिश भी आराम से होगी और पेटीकोट पर तेल भी नहीं लगेगा.

बुआ ने पेटीकोट का नाड़ा ढीला किया तो मैं उनकी कमर पर मालिश करने के साथ-साथ थोड़ा नीचे की तरफ़ भी मालिश करने लगा.

थोड़ी देर मालिश करने के बाद वो बोली, बस बेटा अब आराम है और नाड़ा बंद कर लेट गईं. मैं भी उनकी बगल में आकर लेटकर बुआ को कैसे चोदा जाए इस बारे में विचार करने लगा!

आधे घण्टे के आराम के बाद बुआ उठी और साड़ी पहन कर फिर से अपने काम में लग गईं और दिनभर काम करने के बाद शाम को करीब 6 बजे हम घर पहुँचे.

घर पहुँचकर मैंने कहा- माँ मैं बाजार जा रहा हूँ थोड़ी देर घूमकर आ जाऊँगा. और ऐसा कहकर मैं बाजार की ओर निकल पड़ा.

साथियो आगे की कहानी के लिए अगले भाग का इंतजार करिए और ऐसी ही मस्त स्टोरी के लिए पढ़िये freesexstory.online.

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